संत मीराबाई और उनकी पदावली << खरीदें सं. बलदेव वंशी << आपका कार्ट पृष्ठ : 148 << अपने मित्रों को बताएँ मूल्य : $ 10.95 प्रकाशक : परमेश्वरी प्रकाशन आईएसबीएन : 81-88121-75-4 प्रकाशित : मार्च ०४, २००६ पुस्तक क्रं : 4448 मुखपृष्ठ : सजिल्द सारांश: प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश मीराँबाई की गति अपने मूल की ओर है। बीज-भाव की ओर है। भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तिस्व को, मूल को अर्जित किया है। आत्मिक, परम आत्मिक उत्स (कृष्ण) से जुड़कर जीवन को उत्सव बनाने में वह धन्य हुई। अस्तित्व की गति, लय, छंद को उसने निर्बंध के मंच पर गाया है। जीया है। मीराँ उफनती आवेगी बरसाती नदी की भाँति वर्जनाओं की चट्टानें तोड़ती, राह बनाती अपने गंतव्य की ओर बे रोक बढ़ती चली गयी। वर्जनाओं के टूटने के झंकार से मीराँ की कविता अपना श्रृंगार करती है। मीराँ हर स्तर पर लगातार वर्जनाओं का क्रम-क्रम तोड़ती चली गई। राजदरबार की, रनिवास की, सामंती मूल्यों की, पुरुष-प्रधान समाज द्वारा थोपे गए नियमों की कितनी ही वर्जनाओं की श्रृंखलाएँ मीराँ ने तोड़ फेंकी और मुक्त हो गई। इतन...